Sunday, June 21, 2020

पापा का प्यार

पापा ने सबसे अच्छा काम किया है मुझे boarding स्कूल भेजने के पहले यह अमूल्य भेंट दे कर। लिखावट उन्हीं की है ( कृपया नीचे फोटो देखें) मैं नवोदय में पढ़ी हूँ। पापा ने मुझे वहाँ छोड़ने से पहले इस महाकाव्य के माध्यम से बाबा तुलसीदास से मिलवाया और सच कहती हूँ , आप खुद से पढ़ कर देख लीजिये। जीवन की ऐसी कोई समस्या ही नहीं है जिसका समाधान यहाँ उपलब्ध नहीं। सिर्फ दार्शनिक समस्याओं की बात नहीं कर रही , हमारी millennial problems का भी। ब्यॉयफ्रेंड/गर्लफ्रेंड से झगड़ा हुआ है तो भी श्री रामचरित मानस पढ़िए। प्रेम के एक नए रूप से मिलेंगे आप यहाँ। Nepotism का सामना करना पड़ रहा हो तो भी इन्हें पढ़िए , आप जो deserve करते हैं , वो नहीं मिला , या छीन गया हो तब तो एकदम से सही जगह है। इस पर एक अलग पोस्ट बाद में।





माता -पिता के बारे में लिखना मुश्किल होता है। कई बार भावनाएँ बीच में आ जाती है और कई बार लगता है कि लिखने की क्या जरुरत, जो है सो तो है ही लेकिन जिन लोगों ने मेरे मदर्स डे वाली पोस्ट पढ़ी होगी,उन्हें पता होगा कि आज मेरा लिखना जरुरी क्यों है। पोस्ट की लिंक-My Mother's day story !
पापा बताते हैं - मैं बहुत छोटी थी, 9 महीने की, पापा NCC की ट्रेनिंग के लिए कोयंबटूर गए थे, 2 महीने के बाद लौटे थे।पापा का कहना है कि जब वह लौटे तो मेरे गाल फटे थे, नाक बह रही थी और तब उन्होंने मेरे गाल में boroline लगाया और नाक पोंछ कर मोज़े पहनाये। यह पूरी घटना मैंने अब तक लगभग 100 बार तो जरूर सुनी होगी और हर बार इस पूरे प्रकरण के माध्यम से वह बस यही सिद्ध करना चाहते हैं कि वे मुझे माँ से ज्यादा प्यार करते हैं। उनकी अनुपस्थिति में माँ मेरा ढंग से ध्यान नहीं रख रही थी। माँ ने कभी भी इस बात को गंभीरता से नहीं लिया,मतलब प्यार वाली बात नहीं ,नाक बहने और गाल फटने वाली बात।आज भी लिखने के पहले मैंने माँ से पूछा कि गाल फटे थे कि नहीं तो वो बोली -अरे यार, दिसंबर का महीना था , हम शादी में गए थे , फटे होंगे , इसमें क्या बड़ी बात।तुम्हारे पापा को तो बस मौका मिलना चाहिए। जैसे सब वही किये हैं। हम तो कुछ किये ही नहीं।और ऐसे अनेकों किस्से हैं पापा के पास लेकिन माँ के पास हर उस किस्से को बस पापा की एक चाल बताने की काबिलियत है। बाकी तो हम तीनों को पता है कि ये सब बस प्यार दिखाने के तरीके भर हैं। माँ -पापा दोनों के ही प्यार को माप सकने की काबिलियत न है मुझमें और न ही इसकी जरुरत है। मेरे तो मज़े हैं बस।सुनती रहती हूँ और खुश होती रहती हूँ।
लेकिन पापा ऐसे ही हैं। उन्हें boroline से भी बहुत प्यार है और मुझसे भी और शायद उस हर मौके से , जहाँ उन्हें ये साबित करने का मौका मिल जाता है कि वो मुझसे ज्यादा प्यार करते हैं। हम दो भाई -बहन हैं। भैया मुझसे दो साल बड़ा है। भैया को लेकर पापा की माँ के साथ कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है। लेकिन हाँ भैया के राममय व्यक्तित्व और उसका नाम "राम" होने के कारण वो भैया से एक दूसरे स्तर पर जुड़े हैं। भैया शांत स्वभाव का है ( ऐसा माना जाता है बस ,मेरी भाभी के साथ समय बिताइए या फिर भैया को ठीक सुबह आठ बजे खाने को न मिले या आलू भुजिया का जीरा थोड़ा कम भुना हो तो राम, लक्ष्मण भी बन जाते हैं )सो पापा को बात मनवानी होती है तो भैया उनकी ढाल है।
माननी तो सबको पड़ती है उनकी बात, लेकिन मैं विरोध कर के , एक योद्धा की भाँति लड़ कर संधि करती हूँ और भैया पहले संधि कर लेता है ,फिर बात शुरू करता है।तो भैया उनका favourite है लेकिन उनके कथानुसार वो भैया से ज्यादा प्यार मुझे करते हैं।अगर कभी मैं नाराज होती हूँ तो ये उनका आखिरी ,पहला और एकमात्र arguement होता है।उन्हें लगता है कि मुझे इससे कुछ फर्क पड़ता है लेकिन भैया या मुझमें कोई अंतर तो है नहीं सो अब मुझे उनकी मासूमियत पर प्यार आता है।मेरी कोई जिद नहीं होती है कभी, या ना ही पापा को जिद पूरी करके मनाना आता है, सो मेरी और उनकी लड़ाई बस सैद्धांतिक होती है। लोगों को ये ग़लतफ़हमी होती है कि हम बात नहीं कर रहे या झगड़ रहे तो चलो कुछ gossip बना लिया जाये लेकिन हमारे सिद्धांत इस बात पर परस्पर विरोधी हैं कि छठ पर्व के दूसरे अर्घ्य और पूजा के समापन के बाद पारण कब करना चाहिए।
पापा का सिद्धांत है कि वे पहले आये हुए सभी लोगों को प्रसाद बाँट लेंगे तब ही जल ग्रहण करेंगे। इसमें कम से कम एक घंटे का अतिरिक्त समय लगता है , पूजा समाप्ति के बाद, मेरा ये मत है कि वे पहले जल पी लें , आतिथ्य -सत्कार बाद में करें या हम लोगों पर थोड़ा विश्वास कर लें। बात नहीं बनती तो तनातनी हो ही जाती है।और भी ऐसी कई बातें है जिनपर हम यदा-कदा झगड़ लेते हैं। और हम हैं भी एक दूसरे के टक्कर के, सो मज़ा भी आता है।लेकिन हैं तो हम बाप -बेटी हीं। बस कभी कभी उन्हें ज्यादा बुरा लग जाता है तो फ़ोन उठा कर छोड़ देते हैं।मतलब फ़ोन उठाते हैं , बस बात नहीं करते।
हाँ, एक बात और, अगली बार अगर हम आप लोगों में से किसी के सामने लड़ें तो बस प्रसाद ग्रहण कीजिये और चलते बनिए।
रंग-रूप और कद -काठी में मैं पापा पर ही गयी हूँ। कुछ लोग कहते हैं कि गुस्सा भी मैं उनके जैसा ही करती हूँ लेकिन मैं नहीं मानती इस बात को। मेरा गुस्सा मेरी अपनी दुर्बलता का परिणाम है और उनका गुस्सा उनकी दुर्बलता का। अभी पिछले दिन उन्होने फेसबुक लाइव पर "हरि ॐ तत्सत" के अर्थ और प्रयोग पर अपनी प्रस्तुति दी थी। उसे सुनने के बाद मुझे कुछ लोगों ने बोला कि अब समझ में आया कि तुम्हारे गुरु कौन हैं।
यद्यपि मुझे अच्छे से पता है कि मेरे जीवन में पापा का योगदान क्या है, लेकिन इस "गुरु" शब्द ने मुझे प्रभावित किया। माता -पिता हमारे सर्वप्रथम गुरु हैं , यह सर्वविदित है और सब मानते भी हैं लेकिन कैसे ? उम्र के एक पड़ाव पर पहुँचने के बाद इस प्रश्न पर चिंतन करना आवश्यक हो जाता है कि हमने अपने माता -पिता से वास्तव में क्या सीखा है?उनकी शिक्षा वर्तमान के सापेक्ष्य में कितनी प्रासंगिक है , इस पर भी चिंतन आवश्यक होता है। उनकी सीख का ऐसा कौन सा पक्ष है जिसमें अगली पीढ़ी को देने के पहले थोड़े से परिवर्तन की आवश्यकता है? इन सारे प्रश्नों के बीच मुझे जो समझ में आया वो ये कि पापा वास्तव ही में गुरु हैं हम दोनों भाई-बहनों के।उन्होंने ही तो सिखाया है हम दोनों को , प्रश्न पूछना और उत्तर ढूँढना।चिंतन करना और निष्कर्ष पर पहुँचना।और उस से भी बड़ी बात ये कि उन्होंने कभी ये पता नहीं चलने दिया की वो सीखा रहे हैं।
वो बस करते गए और हम देखते रहे और अब पता चला कि वो सीखा रहे थे। संस्कृत भी मैंने ऐसे ही सीखा। मुझे याद है एक दिन श्री सत्यनारायण भगवान् की पूजा के बाद जब कथा पढ़ने की बारी आयी तो उन्होंने बाबा ( स्वर्गीय पंडित श्री जगन्नाथ मिश्र जी) से कहा कि आज निधि को पढ़ने दीजिये। बस लगभग 20 लोगों की audience में बिना तैयारी मेरा debut पापा ने प्लान कर दिया था। घोर Nepotism कह सकते हैं आप।बस अंतर इतना ही है कि ऐसा platform वो लगभग हर महीने देते थे किसी न किसी को कुछ साल पहले तक। माँ ने बहुत कुछ झेला भी है इस स्वभाव के कारण लेकिन वो पत्नी है और स्वयं भी सही-गलत समझती है सो दोनों ने मिलकर बहुतों को ज्ञान-दान दिया है और आज जब मैं ये सब लिख रही हूँ तो समझ में आता है कि माँ और पापा दोनों ने मिलकर " गुरु " शब्द को सार्थक किया है।
यही होता है हमेशा , माँ को लिखती हूँ तो पापा लिखे चले जाते हैं और जब पापा को लिखती हूँ तो माँ नहीं छूटती। बस भगवान् से प्रार्थना है कि आज की पोस्ट के बाद दोनों लड़ें नहीं कि किसको ज्यादा wordspace मिला है। पापा का सबसे बड़ा योगदान यही है मेरे जीवन में की उन्होंने मुझे सिखाया कि-
💧अगर माँगना है तो भगवान से माँगो
💧आखिरी क्षण तक आशा मत छोड़ो
💧सामान्य परिस्थितियों में धैर्य रखो न रखो , विषम परिस्थिति में धैर्य से ही काम होता है
💧 जिद जरूरी है
💧अगर बात करनी हो तो सबसे पहले भाई -बहन, आपस में बात करो
💧 जो भी कमाओ , उसका छोटा सा भी हिस्सा सुपात्र को दान अवश्य दो
और भी कई बातें हैं ,इन दो लोगों पर तो कितना भी लिखो , न कलम थकती है और न विचारों की कमी होती है औरअभी तो बहुत कुछ सीखना बाकी है। आज जब मैंने बताया कि आज father's Day है तो उन्होंने सबसे पहले यही कहा कि बक्सी जी को फोन कर लो।बक्सी जी मतलब विवाह के बाद मेरे नए वाले पापा।
पापा को लगता है,दायित्व अभी भी उनका ही है मेरे प्रति, लेकिन उनसे ज्यादा पिता होने का अधिकार अब बक्सी जी के पास है।बक्सी जी हैं भी ऐसे ही। उनके बारे में यहाँ जानिये-
दायित्व का स्थान असहमति से सदैव ऊँचा होता है।
और हाँ एक बात बताना तो भूल ही गई मैं , पापा सेवानिवृत प्राचार्य एवं जीव विज्ञान के शिक्षक हैं,Retirement के बाद अभी संस्कृत में M.A. कर रहे हैं।एक सेमेस्टर की परीक्षा बाकी है बस।और अब तक तो आपको समझ में आ ही गया होगा पिता श्री मेरे गुरु क्यों हैं।
डॉ0 निधि भारती
पुत्री - श्री अखौरी रवींद्र प्रसाद
(अब दुविधा में हूँ की माँ का नाम कैसे न लिखूँ )

Tuesday, May 26, 2020

प्रवासी मजदूर ..........................?



सवाल करने हैं  साहब तो सही सवाल कीजिये।
जो अर्जुन ने सही सवाल न किये होते तो श्रीमद्भगवद्गीता अस्तित्व में आयी ही नहीं होती ।
सब कृष्ण बनें बैठे हैं , उपदेश पर उपदेश , अर्जुन बनना तो कोई चाहता ही नहीं।

बीएचयू  के दिनों में एक बार वाद-विवाद प्रतियोगिता में विषय  था-
" प्रवासी भारतीयों का  देश  के विकास में महत्वपूर्ण  योगदान है   "
मैंने पक्ष में बोला था , विशुद्ध  आर्थिक आँकड़ों  से भरे  थे मेरे तर्क और आँकड़े  सत्य भी थे।
इसी सन्दर्भ में अपना पक्ष तैयार करने के दौरान पता चला था कि प्रवासी भारतीय दिवस मनाया जाता है  सन् 2000 से। इसी साल से झारखण्ड भी बिहार से अलग होकर एक नया राज्य बना था।
खैर ,
आज भी वाद-विवाद चल रहा है और विषय है " प्रवासी मजदूर  .....................................?
आपको पता है तो Please fill in the blank !

विषय आज किसी को पता नहीं , सब बस तर्क दिए जा रहे हैं।  ऐसे हीं बस।  किसी को कहानी लिखनी है ,किसी को कविता , कुछ लोग फोटोग्राफी भी कर रहे हैं और इसके बाद सब वही ..वाद -विवाद। ऐसे जैसे मानो इसके बाद पुरस्कार -वितरण भी होना है।

*****
अब पोस्ट  आगे पढ़ने के पहले एक बात जान लीजिये मेरे बारे में,
मेरा जन्म झारखण्ड  में हुआ है  और प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा  भी, तो मैं झारखंडी हूँ। झारखण्ड के बारे में मैंने कहीं से पढ़ कर ज्ञान अर्जित नहीं किया  है। फिर  बारहवीं के बाद मैं झारखण्ड में कभी नहीं रही स्थायी रूप से।
मैं प्रवासी हूँ।  प्रवासी के आगे भारतीय लगाऊँ या मजदूर , ये तय करना मुश्किल लगा। प्रवासी मजदूर लिखूँ तो सब कहेंगे मजाक उड़ा रही हूँ मैं गरीबों का और अगर प्रवासी भारतीय लिखूँ  तो technically गलत हो जायेगा।

*****

बिहार झारखण्ड से 2000 में अलग  हुआ था  और तब राजधानी तो  अलग हो गयी  लेकिन समस्याएँ  अभी भी जस की तस हैं।  जिसे आप सब  कोरोना की आड़ में नयी त्रासदी  बता रहे हैं और कवितायेँ और लेख
लिख -लिख कर अपनी क्रियात्मकता के नमूने पेश कर  रहे हैं और वाहवाहियाँ भी बटोर रहे हैं , वो हम सभी "प्रवासियों " का जीवन सत्य है।  

पढ़ रही हूँ फेसबुक पर ,ट्विटर पर, यहाँ वहाँ ,न्यूज़ चैनलों पर।  अचानक से प्रवासी मजदूर trend  कर रहे हैं, सोशल मीडिया पर। फोटो  ही फोटो है। कुछ लोग वास्तव में व्यथित हैं मगर ये विषय ऐसा नहीं था जहाँ व्यथा को कथा बना कर , लिख-पढ़ कर , सवाल पूछ कर ,जवाब दे दिए जाएँ।

तो प्रवासी मजदूर आज समस्या बन गए हैं। बात ऐसी है कि  समस्या प्रवासी मजदूर नहीं हैं , उन्हें घर भेजना है। ये सारा बवाल असल में logistics  का है बस। सरकार की विफलता यही है कि वह बस और ट्रेन मुहैया नहीं करा रही। विद्वता की पराकाष्ठा है यह जिन्हें यह लगता है कि यह कोई नयी और आकस्मिक समस्या है।हम तो इस समस्या से काफी अरसे से परिचित हैं , अगर आपको होली या दिवाली या छठ में  झारखण्ड ,बिहार, उत्तरप्रदेश ,मध्यप्रदेश या राजस्थान, उड़ीसा  जाना है और आप प्रवासी हैं तो तत्काल में भी रिजर्वेशन कन्फर्म नहीं हो पाता , तीन महीने पहले से लो तब जा कर कन्फर्म टिकट मिलेगी।और यह तब, जब परिस्थितियाँ सामान्य होती हैं ,कोरोना नहीं होता है। ऐसा चल रहा है सालों से लेकिन काम चल रहा था सो कवितायेँ नहीं लिखीं गयीं।

कैसे सोच भी  सकते हैं हम कि ऐसी विकट स्थिति में सभी प्रवासियों को एक साथ  कन्फर्म  टिकट मिल जाता और वो भी तत्काल।

खैर छोड़िये,
मोदी को कुछ गालियाँ दे दीजिये और साथ में राहुल गाँधी की वो प्रवासी मजदूरों के साथ  वाली वीडियो भी फॉरवर्ड कर दीजिये , बड़ी तसल्ली मिलेगी आपको , ऐसा लगेगा कि  आपने भी कुछ contribute किया।

आगे चलते हैं ,
आज कल मेरे  पति इन्हीं  प्रवासी मजदूरों की घर वापसी पर काम कर रहे हैं। जिस दिन सफलता मिलती है, इन्हें बस या ट्रेन पर चढ़ा आते हैं  उस दिन उन  प्रवासी मजदूरों की ख़ुशी मेरे घर तक भी पहुँच  जाती है।जब ऐसा नहीं हो पाता तो उनकी उदासी भी पहुँचती है और इसके साथ ही पहुँचते हैं हजारो सवाल।

क्या होता हमारा अगर ये नौकरी नहीं होती?
इसके पहले हम जहाँ थे वहाँ की नौकरी स्थायी नहीं थी , अक्सर यही सोचती हूँ कि कोरोना अगर 5 साल पहले आया होता तो शायद हम भी ऐसे ही किसी ट्रेन या बस के इंतज़ार में होते।आज हमारे पास स्थायी  नौकरी है , अच्छी तनख्वाह है , तमाम कोरोना कटौतियों के बाद भी खाने पीने और रहने की समस्या नहीं होगी और रोजगार सुरक्षित है।
लेकिन क्या होता  हमारा अगर ये नौकरी नहीं होती?

तो बात बस Logistics की नहीं है।
सरकार तो तभी विफल हो गयी थी जब हम जैसे लोग पहले  शिक्षा और फिर रोज़गार की तलाश में घर छोड़ने को मज़बूर हो गए थे। जो पढ़ सकता था ,वह पढ़ने निकला, जो काम कर  सकता था वो काम की ख़ोज  में निकला लेकिन निकल तो सभी गए। प्रवास ही निवास हो गया।
हमारे यहाँ झारखण्ड -बिहार में एक कहावत सी हो गयी है  कि लड़की क्या , लड़के भी तो पराया धन ही हैं , बहुत रहेंगे तो बारहवीं तक साथ रहेंगे , फिर पहले कोचिंग के लिए , फिर पढ़ाई के लिए , फिर नौकरी के लिए , बाहर ही रहना है।  लड़के या लड़की  अब पराया नहीं ,प्रवासी धन हैं।

तो सभी प्रवासी मजदूर ही हैं , हाँ कुछ बुद्धिजीवी सवाल करेंगे कि कहाँ आप और कहाँ बेचारे मजदूर तो भाई , एक बात समझ लीजिये कि, घर हम जैसे मध्यमवर्गीय लौटें या मजदूर , राहत के नाम पर  बस छत ही रहेगी सर के ऊपर , बस एक मकान रहेगा जिसमें रहने का किराया नहीं लगेगा , इसके बाद जीने -खाने की समस्या सबकी बराबर ही है। असल में हम भारतीयों की समस्या यही है , जब तक रोग कैंसर न हो जाये , डॉक्टर के यहाँ जाना किसी को नहीं पसंद। जब तक प्रवासी अपने घर-परिवार से दूर , एक झोपड़ी में रहकर भी आपकी इमारतें  बना रहे थे, आपने तो एक बार भी संवेदना या सक्रियता नहीं दिखाई फिर आज किस बात का दुःख है आपको ? अगर यही प्रवासी मजदूर आराम  से अपने घर पहुँच गए होते तो आप बस इसी बात पर दुःख मनाते कि  झाड़ू -पोछा करने कौन आएगा। आपको चिंता प्रवासियों की नहीं है साहब , आपको चिंता अपने फेसबुक वाल की है।

हम जैसे प्रवासी लोगों के लिए क्या सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि जिस स्थान को कर्मभूमि मानकर हम जैसे प्रवासी अपना घर -परिवार सब छोड़ कर  बस विश्वास और आशा के बल पर  चल देते हैं , वही स्थान , वही कर्मभूमि , विपरीत परिस्थितयों में हमें अपने घर वापस जाने तक की मदद नहीं दे सकती।

चलते चलते एक बात समझ लीजिये,
जो प्रवासी मजबूर हैं वे प्रवासी मजदूर हैं और जो नहीं हैं वो प्रवासी भारतीय हैं।

जो सवाल पूछने हैं तो पूछिए कि जिन्हें घर पहुँचने को लेकर आप इतने व्यथित हैं , वो घर पहुँचने के बाद करेंगे क्या ? सरकार कब तक मुफ्त का भोजन कराएगी और रोजगार कहाँ से आएगा ? पप्पू की बचत से आएगा क्या ये खर्च या फिर हम जैसे प्रवासियों ( जो न प्रवासी मजदूर की श्रेणी में आते हैं न ही प्रवासी भारतीय के) के  वेतन में  और कटौती की योजना बन रही है ?

खैर छोड़िये , रहने दीजिये अभी।
ये सवाल प्रवासी मजदूरों के घर पहुँचने  के बाद कीजियेगा , ये अभी trending नहीं है।
मोदी को गरियाने के लिए topic  भी तो पहले से सोच कर रखना है।

*****************************##############**************************


http://nidhibharati88.blogspot.com/








पापा का प्यार

पापा ने सबसे अच्छा काम किया है मुझे boarding स्कूल भेजने के पहले यह अमूल्य भेंट दे कर। लिखावट उन्हीं की है ( कृपया नीचे फोटो देखें) मैं ...