Tuesday, May 26, 2020

प्रवासी मजदूर ..........................?



सवाल करने हैं  साहब तो सही सवाल कीजिये।
जो अर्जुन ने सही सवाल न किये होते तो श्रीमद्भगवद्गीता अस्तित्व में आयी ही नहीं होती ।
सब कृष्ण बनें बैठे हैं , उपदेश पर उपदेश , अर्जुन बनना तो कोई चाहता ही नहीं।

बीएचयू  के दिनों में एक बार वाद-विवाद प्रतियोगिता में विषय  था-
" प्रवासी भारतीयों का  देश  के विकास में महत्वपूर्ण  योगदान है   "
मैंने पक्ष में बोला था , विशुद्ध  आर्थिक आँकड़ों  से भरे  थे मेरे तर्क और आँकड़े  सत्य भी थे।
इसी सन्दर्भ में अपना पक्ष तैयार करने के दौरान पता चला था कि प्रवासी भारतीय दिवस मनाया जाता है  सन् 2000 से। इसी साल से झारखण्ड भी बिहार से अलग होकर एक नया राज्य बना था।
खैर ,
आज भी वाद-विवाद चल रहा है और विषय है " प्रवासी मजदूर  .....................................?
आपको पता है तो Please fill in the blank !

विषय आज किसी को पता नहीं , सब बस तर्क दिए जा रहे हैं।  ऐसे हीं बस।  किसी को कहानी लिखनी है ,किसी को कविता , कुछ लोग फोटोग्राफी भी कर रहे हैं और इसके बाद सब वही ..वाद -विवाद। ऐसे जैसे मानो इसके बाद पुरस्कार -वितरण भी होना है।

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अब पोस्ट  आगे पढ़ने के पहले एक बात जान लीजिये मेरे बारे में,
मेरा जन्म झारखण्ड  में हुआ है  और प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा  भी, तो मैं झारखंडी हूँ। झारखण्ड के बारे में मैंने कहीं से पढ़ कर ज्ञान अर्जित नहीं किया  है। फिर  बारहवीं के बाद मैं झारखण्ड में कभी नहीं रही स्थायी रूप से।
मैं प्रवासी हूँ।  प्रवासी के आगे भारतीय लगाऊँ या मजदूर , ये तय करना मुश्किल लगा। प्रवासी मजदूर लिखूँ तो सब कहेंगे मजाक उड़ा रही हूँ मैं गरीबों का और अगर प्रवासी भारतीय लिखूँ  तो technically गलत हो जायेगा।

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बिहार झारखण्ड से 2000 में अलग  हुआ था  और तब राजधानी तो  अलग हो गयी  लेकिन समस्याएँ  अभी भी जस की तस हैं।  जिसे आप सब  कोरोना की आड़ में नयी त्रासदी  बता रहे हैं और कवितायेँ और लेख
लिख -लिख कर अपनी क्रियात्मकता के नमूने पेश कर  रहे हैं और वाहवाहियाँ भी बटोर रहे हैं , वो हम सभी "प्रवासियों " का जीवन सत्य है।  

पढ़ रही हूँ फेसबुक पर ,ट्विटर पर, यहाँ वहाँ ,न्यूज़ चैनलों पर।  अचानक से प्रवासी मजदूर trend  कर रहे हैं, सोशल मीडिया पर। फोटो  ही फोटो है। कुछ लोग वास्तव में व्यथित हैं मगर ये विषय ऐसा नहीं था जहाँ व्यथा को कथा बना कर , लिख-पढ़ कर , सवाल पूछ कर ,जवाब दे दिए जाएँ।

तो प्रवासी मजदूर आज समस्या बन गए हैं। बात ऐसी है कि  समस्या प्रवासी मजदूर नहीं हैं , उन्हें घर भेजना है। ये सारा बवाल असल में logistics  का है बस। सरकार की विफलता यही है कि वह बस और ट्रेन मुहैया नहीं करा रही। विद्वता की पराकाष्ठा है यह जिन्हें यह लगता है कि यह कोई नयी और आकस्मिक समस्या है।हम तो इस समस्या से काफी अरसे से परिचित हैं , अगर आपको होली या दिवाली या छठ में  झारखण्ड ,बिहार, उत्तरप्रदेश ,मध्यप्रदेश या राजस्थान, उड़ीसा  जाना है और आप प्रवासी हैं तो तत्काल में भी रिजर्वेशन कन्फर्म नहीं हो पाता , तीन महीने पहले से लो तब जा कर कन्फर्म टिकट मिलेगी।और यह तब, जब परिस्थितियाँ सामान्य होती हैं ,कोरोना नहीं होता है। ऐसा चल रहा है सालों से लेकिन काम चल रहा था सो कवितायेँ नहीं लिखीं गयीं।

कैसे सोच भी  सकते हैं हम कि ऐसी विकट स्थिति में सभी प्रवासियों को एक साथ  कन्फर्म  टिकट मिल जाता और वो भी तत्काल।

खैर छोड़िये,
मोदी को कुछ गालियाँ दे दीजिये और साथ में राहुल गाँधी की वो प्रवासी मजदूरों के साथ  वाली वीडियो भी फॉरवर्ड कर दीजिये , बड़ी तसल्ली मिलेगी आपको , ऐसा लगेगा कि  आपने भी कुछ contribute किया।

आगे चलते हैं ,
आज कल मेरे  पति इन्हीं  प्रवासी मजदूरों की घर वापसी पर काम कर रहे हैं। जिस दिन सफलता मिलती है, इन्हें बस या ट्रेन पर चढ़ा आते हैं  उस दिन उन  प्रवासी मजदूरों की ख़ुशी मेरे घर तक भी पहुँच  जाती है।जब ऐसा नहीं हो पाता तो उनकी उदासी भी पहुँचती है और इसके साथ ही पहुँचते हैं हजारो सवाल।

क्या होता हमारा अगर ये नौकरी नहीं होती?
इसके पहले हम जहाँ थे वहाँ की नौकरी स्थायी नहीं थी , अक्सर यही सोचती हूँ कि कोरोना अगर 5 साल पहले आया होता तो शायद हम भी ऐसे ही किसी ट्रेन या बस के इंतज़ार में होते।आज हमारे पास स्थायी  नौकरी है , अच्छी तनख्वाह है , तमाम कोरोना कटौतियों के बाद भी खाने पीने और रहने की समस्या नहीं होगी और रोजगार सुरक्षित है।
लेकिन क्या होता  हमारा अगर ये नौकरी नहीं होती?

तो बात बस Logistics की नहीं है।
सरकार तो तभी विफल हो गयी थी जब हम जैसे लोग पहले  शिक्षा और फिर रोज़गार की तलाश में घर छोड़ने को मज़बूर हो गए थे। जो पढ़ सकता था ,वह पढ़ने निकला, जो काम कर  सकता था वो काम की ख़ोज  में निकला लेकिन निकल तो सभी गए। प्रवास ही निवास हो गया।
हमारे यहाँ झारखण्ड -बिहार में एक कहावत सी हो गयी है  कि लड़की क्या , लड़के भी तो पराया धन ही हैं , बहुत रहेंगे तो बारहवीं तक साथ रहेंगे , फिर पहले कोचिंग के लिए , फिर पढ़ाई के लिए , फिर नौकरी के लिए , बाहर ही रहना है।  लड़के या लड़की  अब पराया नहीं ,प्रवासी धन हैं।

तो सभी प्रवासी मजदूर ही हैं , हाँ कुछ बुद्धिजीवी सवाल करेंगे कि कहाँ आप और कहाँ बेचारे मजदूर तो भाई , एक बात समझ लीजिये कि, घर हम जैसे मध्यमवर्गीय लौटें या मजदूर , राहत के नाम पर  बस छत ही रहेगी सर के ऊपर , बस एक मकान रहेगा जिसमें रहने का किराया नहीं लगेगा , इसके बाद जीने -खाने की समस्या सबकी बराबर ही है। असल में हम भारतीयों की समस्या यही है , जब तक रोग कैंसर न हो जाये , डॉक्टर के यहाँ जाना किसी को नहीं पसंद। जब तक प्रवासी अपने घर-परिवार से दूर , एक झोपड़ी में रहकर भी आपकी इमारतें  बना रहे थे, आपने तो एक बार भी संवेदना या सक्रियता नहीं दिखाई फिर आज किस बात का दुःख है आपको ? अगर यही प्रवासी मजदूर आराम  से अपने घर पहुँच गए होते तो आप बस इसी बात पर दुःख मनाते कि  झाड़ू -पोछा करने कौन आएगा। आपको चिंता प्रवासियों की नहीं है साहब , आपको चिंता अपने फेसबुक वाल की है।

हम जैसे प्रवासी लोगों के लिए क्या सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि जिस स्थान को कर्मभूमि मानकर हम जैसे प्रवासी अपना घर -परिवार सब छोड़ कर  बस विश्वास और आशा के बल पर  चल देते हैं , वही स्थान , वही कर्मभूमि , विपरीत परिस्थितयों में हमें अपने घर वापस जाने तक की मदद नहीं दे सकती।

चलते चलते एक बात समझ लीजिये,
जो प्रवासी मजबूर हैं वे प्रवासी मजदूर हैं और जो नहीं हैं वो प्रवासी भारतीय हैं।

जो सवाल पूछने हैं तो पूछिए कि जिन्हें घर पहुँचने को लेकर आप इतने व्यथित हैं , वो घर पहुँचने के बाद करेंगे क्या ? सरकार कब तक मुफ्त का भोजन कराएगी और रोजगार कहाँ से आएगा ? पप्पू की बचत से आएगा क्या ये खर्च या फिर हम जैसे प्रवासियों ( जो न प्रवासी मजदूर की श्रेणी में आते हैं न ही प्रवासी भारतीय के) के  वेतन में  और कटौती की योजना बन रही है ?

खैर छोड़िये , रहने दीजिये अभी।
ये सवाल प्रवासी मजदूरों के घर पहुँचने  के बाद कीजियेगा , ये अभी trending नहीं है।
मोदी को गरियाने के लिए topic  भी तो पहले से सोच कर रखना है।

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